कुछ ऐसे बिन्दु हैं जो मीडियावालों (जो अमेरिका के प्रभाव में हैं क्योंकि उन्हें बहुराष्ट्रीय कम्पनियों से बहुत ज्यादा विज्ञापन मिलता है) ने हमें कभी नहीं बताया। लेकिन मुख्य घटनाओं पर एक सरसरी नजर डालने से ही यह पता चल जाता है कि भारत और पाकिस्तान दोनों ही देश कारगिल का युद्ध हार गए और यह अमेरिका था जिसने यह युद्ध जीता। निश्चित रूप से, अमेरिका ने यह निर्णय किया था कि वह तत्कालीन (भारतीय) प्रधानमंत्री श्री अटल बिहारी बाजपेयी को अमेरिका को चुनौती देते हुए परमाणु परीक्षण कर डालने के लिए सबक सिखाएगा। इसलिए अमेरिका ने कारगिल के पहाड़ पर पाकिस्तानी सेना की टुकड़ी रखवाने/भिजवाने में जनरल मुशर्रफ की सहायता की। जब युद्ध शुरू हुआ तो उस समय हमलोगों के पास लेजर गाईडेड/निर्देशित मिसाइल/प्रक्षेपास्त्र अथवा लेजर निर्देशित बम तक नहीं थे कि जिससे उन घुसपैठियों को मार गिराएं जो पहाड़ की चोटी पर थे। विमानों/जहाजों और हेलिकॉप्टरों को निशाने पर वार करने के लिए नीची उड़ान भरनी पड़ी थी और ऐसा करने में हमलोगों के अपने जहाज/विमान और हेलिकॉप्टरों को खो दिया यानि वे मार गिराए गए। बोफोर्स तोप के गोले पहाड़ पर दुश्मनों/शत्रुओं को मार गिराने में उपयोगी तो थे लेकिन उनका उपयोग कम ही किया जा सका क्योंकि उनका निशाना उतना अच्छा नहीं था और इसीलिए अधिकांश गोले (लक्ष्य से) इतने ज्यादा दूर गिरते थे कि उनसे ज्यादा नुकसान नहीं पहुंचाया जा सकता था। और इसलिए, हमें अपने हजारों सैनिकों को पहाड़ पर चढ़ने के लिए कहना पड़ा था। दुश्मन चोटी पर था और हमारे सैनिक ऊपर चढ़ रहे थे इसलिए इनमें से अनेकों को अपने प्राण गंवाने पड़े।
स्थिति तब और ज्यादा खराब हो गई जब हमें बोफोर्स तोप के गोले तक भी आयात करने पड़े क्योंकि हमारे पास गोलों तक के निर्माण की क्षमता नहीं थी। और हमें जितनी मात्रा में इन गोलों का प्रयोग करने की जरूरत थी, उससे हमारे गोले महीनों में ही खत्म हो जाते। और अमेरिका ने तानाशाही से अपनी शर्तें हम पर थोपीं जिन्हें मानने पर ही हमें बोफोर्स तोप के गोले मिलने थे। इसी दौरान घुसपैठियों को रसद वगैरह पहुंचाने के लिए जिन हेलिकॉप्टरों आदि की जरूरत पाकिस्तान को थी, उनके जरूरी कल-पुर्जे यूरोपियन नाटो देशों के बने हुए थे जो फिर से अमेरिका के नियंत्रण में ही था।
इसलिए जब अमेरिकी राष्ट्रपति क्लिंटन ने मुशर्रफ और नवाज शरीफ से युद्ध रोक देने के लिए कहा तो दोनों को ही अमेरिका की बात माननी पड़ी थी। और जब क्लिंटन ने भारत के प्रधान मंत्री श्री अटल बिहारी बाजपेयी से 25 जुलाई की सुबह 2 बजे (दुश्मन को) सुरक्षित रास्ता दे देने के लिए कहा तो श्री अटल बिहारी बाजपेयी को बात माननी ही थी और दो घंटे के भीतर ही भारत ने पाकिस्तानी सैनिकों को सुरक्षित रास्ता देने की घोषणा कर दी। इसलिए कुल मिलाकर भारत युद्ध हार गया – इसने उन पाकिस्तानी सैनिकों तक को नहीं मारा जो भारत में घुस आए थे और जिन्होंने 800 भारतीय सैनिकों को मार दिया था। पाकिस्तान भी हारा क्योंकि उन्हें अमेरिकी आदेश पर वापस जाना पड़ा और वे अपने मृत सैनिकों के शव/मृत शरीर तक को वापस नहीं ले जा सके। यदि श्री अटल बिहारी बाजपेयी ने क्लिंटन का आदेश किसी अच्छे आज्ञाकारी बालक की तरह नहीं माना होता तो अमेरिका बोफोर्स गोलों की आपूर्ति/सप्लाई रोक देता और सारी मदद पाकिस्तान को उपलब्ध कराता और तब उस परिस्थिति में पाकिस्तान जीत जाता। यदि मुशर्रफ ने क्लिंटन की बात नहीं मानी होती तो क्लिंटन भारत को दी जाने वाली सहायता बढ़ा देते और पाकिस्तान को दी जाने वाली सारी सहायता बाधित करके रोक देते और तब उस परिस्थिति में पाकिस्तान बुरी तरह हार जाता। यह अमेरिका ही था जिसने युद्ध जीता।
जब कारगिल युद्ध प्रारंभ हुआ तो हमने रूस, फ्रांस, अमेरिका और अन्य अनेक देशों से लेजर गाइडेड/निर्देशित मिसाइल/प्रक्षेपास्त्र और लेजर निर्देशित बम हमें बेचने को कहा लेकिन किसी ने भी हमें अंतिम क्षण तक कुछ नहीं बेचा। अंतिम क्षणों में हम केवल कुछ ही ऐसे लेजर गाईडेड बम खरीद सके जिससे पहाड़ की चोटी पर घुसपैठियों को मार सकते थे।
(24.6) हथियार निर्माण के उद्योग-कारखानों में सुधार लाना
यहां मैं पाठकों से एक बिन्दु पर ध्यान देने का अनुरोध करता हूँ : यदि हमलोग लेजर गाईडेड मिसाइल/प्रक्षेपास्त्र और लेजर गाईडेड बम का निर्माण कर रहे होते (बना रहे होते) तो भारत का एक भी सैनिक नहीं मरता। एक भी सैनिक का जीवन खतरे में डाले बिना हम लेजर गाईडेड मिसाइल/प्रक्षेपास्त्र और लेजर गाईडेड बम का प्रयोग करके सभी घुसपैठिए पाकिस्तानी सैनिकों को मार सकते थे। यहीं पर सेना सिविल/असैनिक विभागों पर बहुत ज्यादा निर्भर करती है। प्रधान मंत्री, वित्त मंत्री आदि के भ्रष्टाचार के कारण हम इन हथियारों का विनिर्माण/निर्माण नहीं कर पाए। कुल मिलाकर, भ्रष्ट राज्यव्यवस्था को देखते हुए, इंदिरा गाँधी की मौत के बाद से हमारा हथियार निर्माण कार्यक्रम अस्त व्यस्त ही था और हमें इसमें जल्दी से जल्दी सुधार करना ही होगा।
प्रजा अधीन राजा समूह/राइट टू रिकॉल ग्रुप की मांगों में से एक प्रमुख मांग यह है कि अर्थव्यवस्था और राज्यव्यवस्था में सभी जरूरी परिवर्तन किए जाएं ताकि हथियार बनाने की भारत की क्षमता अमेरिकी क्षमता के स्तर की बराबरी पर आ जाए।
(24.7) हमारी परमाणु हथियार और परमाणु क्षमताएं की परिस्थिति कितनी बुरी हैं ?
निम्नलिखित तालिका यह दिखलाएगी कि हमारी परमाणु क्षमताएं कितनी निराशाजनक हैं–
रूस
अमेरिका
चीन
इंग्लैण्ड
भारत
परमाणु विस्फोटों की संख्या
715
1054
45
45
6
वायुमंडलीय परमाणु विस्फोटों की संख्या
>200
331
22
8
शुन्य
उच्च क्षमता वाले विस्फोटों की संख्या
7
14
योजना बना ली गई है
0
शुन्य
लेजर विस्फोट, किलो टन में
50000
15000
4300
200
45
न्यूटॉन बम
हां
हां
हां
??
नहीं
चीन ने वर्ष 1968 में 3000 किलो टन का एक वायुमंडलीय विस्फोट किया। हमारी सबसे ज्यादा क्षमता वाला/बड़ा विस्फोट मात्र 45 किलो टन का था, जो किसी कौवे को भी नहीं डरा सकता था। इसलिए 40 वर्षों के लम्बे अंतराल के बाद भी हमारी परमाणु क्षमता चीन के 1/75 वें हिस्से के बराबर है। और भी ज्यादा हताश करने वाली बात यह है कि पोखरण – 2 असफल रहा था। पाठकों को शायद यह मालूम नहीं होगा, लेकिन सारे आंकड़े अब यही साबित करते हैं कि परमाणु विस्फोट तो हुआ था लेकिन थर्मो- न्युक्लियर विस्फोट, जिसे परमाणु विस्फोट के बाद होना था वह असफल हो गया। अटल बिहारी बाजपेयी, अब्दुल कलाम आजाद आदि लोगों ने भारतीय नागरिकों के सामने झूठ बोला लेकिन अमेरिका और चीन जैसे दुश्मन देश जानते हैं कि हमारे परमाणु हथियार असफल/बेकार हैं।
इसका हल वायुमंडलीय टेस्ट/परीक्षण हैं। भूगर्भ परीक्षणों की ताकत सेस्मिक कम्पन/तरंगों से की जाती है जिनमें आंकड़ों में फेरबदल कर देना आसान होता है। लेकिन वायुमंडलीय परीक्षणों में परीक्षण स्थल से विभिन्न स्थानों/दूरियों पर हवा/वायुमंडल् में तापमान द्वारा इनकी माप की जा सकती है। इससे तापमान/उष्मा का सही-सही माप मिलता है जिससे विस्फोट की ताकत का मापन कर लिया जाता है। यदि चीन वर्ष 1968 में ही 3000 किलो टन के वायुमंडलीय बम विकसित करके उसका विस्फोट (करके परीक्षण) कर सका और यदि रूस 1950 के दशक में ही 50,000 किलो टन का विस्फोट कर सका तो हम भी आने वाले 10 वर्षों में कम से कम एक 3000 किलो टन का निर्माण करके उसका परीक्षण तो कर ही सकते हैं। प्रजा अधीन राजा समूह/राइट टू रिकॉल ग्रुप के प्रस्तावों में से मेरा एक प्रस्ताव अगले 10 वर्षों में एक 3000 किलो टन का वायुमंडलीय परमाणु परीक्षण आयोजित करना है।
इसके अलावा, हमारे परमाणु हथियार भंडार चीन का 1/20 वां हिस्सा भी नहीं हैं और यह अमेरिका और रूस की तुलना में तो यह बहुत मामूली है। हमें कम से कम एक ऐसा परमाणु हथियार (भण्डार) तैयार करना चाहिए जो कम से कम चीन के परमाणु हथियार (भण्डार) की बराबरी का हो।
No comments:
Post a Comment